काली चुड़ैल और मासूम मुनिया - बुरी आत्मा या कोई काली शक्ति Short Story in Hindi

गांव के बच्चों पर यह किसका काला साया पड़ा था जो उन्हें उठा कर ले जाता था। चंद्रू ने किसी भयानक औरत को देखा था। कौन थी वो? गायब हुए बच्चे कहाँ गए ? क्या वो कभी लौटेंगे ? पढ़े Short Story in Hindi काली चुड़ैल और मासूम मुनिया

Short Story in Hindi काली चुड़ैल और मासूम मुनिया 

भाग -1 
एक बुरी आत्मा या कोई काली शक्ति 


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एक था प्यारा सा गांव 

यह Short Story in Hindi काली चुड़ैल सुंदर नगर की है। सुंदर नगर एक छोटा सा गांव था जो कि हिमालय की तलहटी में बसा था।


गांव के लोग पहाड़ों पर बने सीढ़ी नुमा खेतों पर खेती करके अपना जीवन यापन करते थे।


लेकिन गांव में हर काम का कारीगर मौजूद था जो कि छोटे पैमाने पर उत्पादन करता था। इस प्रकार गांव अपने आप में परिपूर्ण था।


गांव की सुंदरता की बात करें तो पहाड़ की तलहटी में बस होने के कारण पूरा गांव प्राकृतिक छटाओं से भरपूर था। गांव के आसपास घने जंगल थे, जहां से गांव वालों को अनेक तरह की जड़ी-बूटियां भी प्राप्त होती थी।


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ऐसी थी सब की दिनचर्या 

गांव के लोग सीधे-साधे मिलनसार प्रवृत्ति के थे। किसान दिन भर मेहनत मजदूरी करते, अपना खून पसीना खेतों में एक करते और शाम होने पर घर लौट आते। बच्चे दिन भर गुरुकुल में पढ़ने जाते और औरतें घर संभालतीं। 


गांव में कुछ ज्यादा परिवार नहीं थे, सिर्फ पचास परिवारों का ही गांव था। शाम के बाद सबकी महफिल गांव के चौक में स्थित बरगद के पेड़ के नीचे जम जाती। गांव वालों ने बरगद के पेड़ के नीचे बहुत बड़ा चबूतरा बना दिया था। वहां पर जवान और बूढ़े आदमी इकट्ठे होकर चौपाल लगाते और हंसी-मजाक करते, विभिन्न मसलों पर बातचीत भी करते।


गांव की अधिकतर औरतों वहीं नजदीक ही जमीन पर दरी-चटाइयां बिछाकर बैठ जातीं और ढोलकी-मंजीरे बजाकर भगवान का भजन-कीर्तन करतीं, और बच्चे वहीं पर खेलते। फिर धीरे-धीरे जब रात गहराने लगती तो सब लोग एक-एक करके घर लौट जाते। 


इस तरह से उनका दिन बीतता था और फिर अगली भोर तड़के किसान अपने खेत पर निकल जाते और घर की औरतें वही अपने रोज के कामों में लग जातीं।


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बड़ी साधारण सी जिंदगी थी गांव वालों की और ज़रूरतें कम थी। बोली में मिठास थी, दिल में सफाई थी और चेहरे पर संतुष्टि थी। दिन में सौ बार ईश्वर का धन्यवाद करते,बड़े बूढ़ों का आदर करते और हम उम्र लोगों का सम्मान करते।

एक दिन की बात है 

ऐसे ही जीवन चल रहा था कि एक दिन की बात है, जब सब लोग वहीं बरगद के पेड़ के नीचे जमा थे। शाम का वक्त था। बच्चे भी पास ही गिल्ली डंडा खेल रहे थे। तभी चंद्रू ने जोर से गिल्ली पर डंडा मारा और वो गई गिल्ली आसमान से बातें करती हुई।


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जा-जा, अब तू ही लेकर आ। कितनी बार बोला है इतनी दूर गिल्ली मत फेंका करो। अब ढूंढते रहो जाकर, कहां गिरी है सोन चिरईय्या - बाबू बोला।


अरे जा रहा हूं ना। चिढ़ता क्यों है? लौटूंगा नहीं बिना लिए तेरी गिल्ली।


चल आ री मुनिया, लेकर आए हम गिल्ली- चंद्रू ने मुनिया से कहा और मुनिया सिर हिलाती हुई उसके साथ चल पड़ी। मुनिया बाबू की छोटी बहन थी।


शाम कुछ ज्यादा ही गहरा रही थी। चंद्रू और मुनिया गिल्ली ढूंढते-ढूंढते गांव के संकरे रास्ते पर काफी आगे निकल आए। लेकिन उन्हें गिल्ली नहीं मिली। मुनिया ने इधर-उधर देखते हुए रुआंसी आवाज में चंद्रू से कहा- इतनी दूर आ गए हम। मुझे डर लग रहा है, चलो वापस चलें।


चंद्रू ने भी जब अपने आसपास देखा तो उसको भी एहसास हुआ कि वास्तव में गिल्ली ढूंढते ढूंढते हुए वे चौपाल से काफी दूर जंगल की तरफ निकल आए थे। उसने भी वापस लौटना ही ठीक समझा।

और फिर हो गई अनहोनी

मुनिया ने चंद्रू का हाथ पकड़ा हुआ था। वापस जाने के लिए जैसे ही वे दोनों मुड़े, एक भयानक सा साया अचानक ऊपर पेड़ों में से उड़ता हुआ लहराता हुआ नीचे की तरफ आया, मुनिया का हाथ चंद्रू के हाथ से झटके से छीना और हवा में ही मुनिया को लेकर उड़ता हुआ गायब हो गया। चंद्रू कुछ समझ ना पाया, बस डर के मारे वह वही जड़ हो गया। चांद की रोशनी में वह इतना ही समझ पाया कि वह साया किसी डरावनी औरत का था।


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सब कुछ अचानक से बहुत ही भयानक हो गया था। किसी तरह से दौड़ता भागता चंद्रू चौपाल पहुंचा और वहां, जहां गांव की औरतें ढोलकी-मंजीरे लेकर बैठी थीं, उनके बीच में जाकर गिर पड़ा। उसके मुंह से बोल नहीं फूट रहा था, सांसें तेज़ दौड़ रही थीं और आंखें डर के मारे फैली हुई थी।


पहले तो गांव की औरतों ने सोचा कि यह खेल-खेल में यहां भाग कर आया है, और पैर अटका तो गिर गया। लेकिन जब उसकी शक्ल देखी और यह देखा कि वह कुछ कहने की कोशिश कर रहा था, मगर कह नहीं पा रहा था, तो उन्होंने उसे आराम से बिठाया और पीने को पानी दिया।


इधर बच्चे भी दौड़ते हुए महिला मंडली के पास आ गए। क्योंकि चंद्रू गया तो गिल्ली लेने था लेकिन गिल्ली देने के लिए बच्चों के पास तो आया नहीं, सीधा भागता हुआ यहां आया और गिर गया। वे भी देखने आए थे कि क्या हुआ।


उन महिलाओं में चंद्रू की मां भी थी। उसने चंद्रू की पीठ पर हाथ फेरा और उसे सामान्य करने की कोशिश की और पूछा कि क्या हुआ है।


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चंद्रू अभी भी डर से कांप रहा था, लेकिन उसको यह संतोष था कि वह अब भीड़ के बीच में था। उसने सब लोगों को सारी बात बता दी कि किस तरह से वह और मुनिया जंगल में गए और किस तरह से एक औरत का साया आसमान में से उड़ता हुआ आया और मुनिया को अपने साथ उड़ा कर ले गया।


मुनिया की मां भी उन्हीं औरतों में थी। सभी औरतों के होश फाख्ता हो गए, और मुनिया की मां वही गश खाकर गिर पड़ी। 


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 किसी को भी समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या था, क्योंकि चंद्रू बहुत ज्यादा ड़रा हुआ था। वह ठीक से बता भी नहीं पा रहा था। बस बार-बार यही बोल रहा था- वो काली औरत मुनिया को ले गई, वो काली औरत मुनिया को ले गई।

लेकिन बचवा, ठीक से याद कर, वो आई कहां से थी?-एक महिला ने पूछा।


वो....वो... उड़ के आई थी और मुनिया को लेकर वापिस उड़ गई।- चंद्रू ने बताया।

औरतों की मंडली में अफरा-तफरी मची देखकर दूर बैठे आदमियों की टोली में से कुछ आदमी इधर उठकर आए, कि देखें क्या बात है। मुनिया का बापू भी इन्हीं आदमियों में था।


जब उनको भी सारी बात पता चली तो मुनिया का बापू बोला - अरे, ऐसे कैसे हो सकता है? आसमान से कहां से आई थी वो? अंधेरा गहरा गया है , नीम अंधेरे में बच्चे को पता नहीं चला होगा, घबरा गया होगा बेचारा।

कुछ लोग गए जंगल को 

तभी दूसरा बोला - जरूर कोई बच्चा- चोर होगी। ज्यादा दूर नहीं पहुंची होगी अभी। चलो, देख कर आते हैं।


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छह-सात हट्टे-कट्टे आदमी और मुनिया का बापू हाथ में लालटेनें और लाठियां लिए उस रास्ते की ओर चल पड़े।

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क्रमशः 

मुनिया को ले कर जाने वाली वो डरावनी औरत कौन थी ? क्या मुनिया अब कभी वापिस लौटेगी ? जानने के लिए पढ़े इस कहानी का दूसरा  भाग खुशहाल गांव को लग गई नज़र यहाँ पर 

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